अली सरदार जाफरी प्रगतिशील शायरों की पहली पंक्ति से संबंध रखते हैं। बलरामपुर जिला गोण्डा (उ.प्र) में 1913 में पैदा हुए। काफी समय तक लखनऊ में रहे। लखनऊ, दिल्ली और अलीगढ में शिक्षा ग्रहण की। शुरू से ही प्रगतिशील धारा में शामिल हो गए। लखनऊ से एक पत्रिका ’नया अदब‘ निकाली। बाद में बम्बई चले गए और फिर वहीं बस गये।
प्रारंभ में उन्होंने कुछ लम्बी नजम प्रकाशित हुईं। ’नई दुनिया को सलाम‘ में उन्हांेने साम्राज्य के समाप्त होने की घोषणा की है। ’खून की लकीर‘, ’एशिया जाग उठा‘, ’अमन का सितारा‘, ’पत्थर की दीवार‘ में भी इंसान दोस्ती की भावना है। सरदार जाफरी ने तरक्की पसंद तहरीक पर समीक्षात्मक पुस्तक तरक्की पसंद अदब के नाम से लिखी। पत्रिका ’’गुफ्तगू‘‘ भी कई वर्षों तक इनके मार्गदर्शन में प्रकाशित होती रही। एक खुश्बू और ’’पैरहने शरर‘‘ और ’’लहू पुकारता है‘‘ इनके बाद के काव्य संग्रह है। प्रगतिशील साहित्य के संबंध में सरदार जाफरी ने सबसे अधिक लिखा है। कई नई बहस पैदा की हैं और सवाल उठाए हैं, जिनमें इत्तिफाक भी किया गया है। और इख्तिलाफ भी। उनकी साहित्यिक सेवा नज्म और नस्र (गद्य, एवं पप्पू) दोनों में हैं, लेकिन बुनियादी तौर पर वो शायर हैं। उनकी शायरी की विशेषताओं में सियासी और कौमी शरूर (राजनैतिक एवं समाजी) उमंग, हौसले शामिल है।
सरदार जाफरी की नज्म
मश्रिक और मग्रिब
एशिया वाले से, योरोप की जमीं खिंच के न मिल,
मेरी सौगात भी दिल है, तिरी सौगात भी दिल।
जिसने लूटा है हमें, जिसने सितम ढाया है,
आरिजे मग्रिब नहीं, मग्रिब का वो सरमाया है।
वो सरमाया न हिन्दी है, न बरतानी है,
वो मेरे और तेरे खूं की अरजानी है।
जंगलों में वोही आवारा हवा गाती है,
किसी भटके हुए रहे रू की सदा लाती है।
कलियां खिलती हैं संवरते हुए गेसू के लिए,
तितलियां उडती हैं बिखरी हुई खुश्बू के लिए।
परियां मौसम की हवाओं में बिखर जाती हैं,
रूत बदलती है, कबातें भी बदल जाती हैं।
रास्ते दौड के स्कूलों में मिल जाते हैं,
बच्चे फूलों की तरह घास में खिल जाते हैं।
यां भी जो आंख है, आलम की तमाशाई है,
हर नजरे लज्जत दीदार की शैदाई है।
खैर हो पेरिस व लन्दन के हुनरदारों की,
खैर हो रोम के, यूनान के बुतकारों की।
तेरे बाजार में युसुफ भी, जुलेखा भी,
तेरे वीरानों में मजनूं भी है लैला भी।
जोर इफलास का, दौलत की फरवानी भी,
यां कुबापोशी भी है, चाक गिरेबानी भी।
हरफे हक भी है यहां और रसनो दार भी,
लज्जते शौक भी है, जुरअते किरदार भी।
हम हकीकत से कभी दूर जो हो जाते हैं,
कुछ मजाहिर के तिलस्मात में खो जाते हैं।
जहर सा नफरत व नखूवत का पिया करते हैं,
यूं ही इंसानों को तक्सीम किया करते हैं।
असलियत निकहते गुल की नहीं गुलदानों से,
मय बदलती नहीं बदलते हुए पैमानों से।
बू-ए-गुल एक सी है, बू-ए-वफा एक सी है,
मेरे और तेरे गजालों की अदा एक सी है।











