भोपाल—–मध्यप्रदेश की राजधानी, कुदरती खूबसूरती से मालामाल बड़े और खूबसूरत तालाबों की नगरी, मौलाना बरकतउल्लाह की पैदाइशगाह। लेकिन ये तमाम पहचानें अधूरी हैं जब तक यहां हर साल होने वाले आलमी तब्लीगी इज्तिमा का जिक्र न किया जाए।
इस आलमी तब्लीगी इज्तिमा में भारत के तकरीबन सभी इलाकों के मुसलमानों के अलावा सऊदी अरब, मलेशिया, इन्डोनेशिया, बांग्लादेश, ईरान, ईराक, श्रीलंका, नेपाल, अफ्रीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, स्पेन, अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, इटली, थाईलैण्ड और दुनिया के कई दूसरे देशों से आने वाली जमातें इसमें शिरकत करती हैं।
दरअसल इज्तिमा का मतलब इकट्ठा या जमा होना है। ये लफ्ज अरबी डिक्शनरी से लिया गया है। हिन्दुस्तान वासियों के लिए ये फख्र की बात है कि भोपाल ही पूरी दुनिया में ऐसा शहर है जहां पिछले 77 सालों से आलमी तब्लीगी इज्तिमा हो रहा है। शुरूआती दौर में ये छोटे पैमाने पर होता था लेकिन आज ये आलमी सतह का प्रोग्राम बन गया है।
भोपाल में इस आलमी तब्लीगी इज्तिमा की शुरूआत 24 दिसम्बर 1948 को मरहूम इमरान खां साहब अजहरी के मुबारक हाथों के जरिये हुई थी। सबसे पहला इज्तिमा मस्जिद शकूर खां में किया गया था। उसके दो साल बाद इसे ताजुल मसाजिद में किया जाने लगा, बाद में लोगों की भारी तादाद को देखते हुए इसे घासीपुरा ईंटखेडी में किया जाने लगा।
भोपाल का आलमी तब्लिगी इज्तिमा दुनिया के 5 सबसे बड़े आयोजनों में से एक माना जाता है दुनिया के सिर्फ 3 देशों भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में इसका आयोजन होता है।
इस इज्तिमा में तब्लीगी जमात के मुबल्लिगों, उलेमा इकराम और मौलानाओं की नूरानी तकरीरें होती है।। वो अपनी तकरीरों और बयानातों के जरिये इन्सानियत का पैगाम तो देते ही हैं साथ ही पैगम्बरे इस्लाम हजरत मोहम्मद सल्ल. के बताये रास्ते पर चलने की बात भी समझाते हैं। इस इज्तिमा में लाखों लोग शामिल होते हैं।
इज्तिमा में शामिल होने की कोई शर्त नहीं है। इसमें हर कोई शामिल हो सकता है। इज्तिमा में किसी खास तबके या खास इलाके के लिए नहीं होता बल्कि यह तो पूरी दुनिया की भलाई के लिए होता है।
इज्तिमा में इन्सानियत का पैगाम, भाईचारे और खुशहाली को कायम रखने की तालीम दी जाती है। इज्तिमा में समाज में आये बिगाड़ को दूर करने की सीख और नेक राह पर चलने की तालीम दी जाती है। यह अपने मुल्क से मोहब्बत करने और आपस में दिलों को जोड़ने का जज्बा पैदा करता है। यह आखिरत की जिन्दगी की फिक्र पैदा करता है, साथ यह हर वक्त खुदा के हाजिर व नाजिर होने के एहसास को जिन्दा रखता है।
इस इज्तिमा का असली मकसद यह है कि वह मुसलमान जो इस्लाम के यानि अपने ही मजहब के बारे में सही तौर पर ज्यादा कुछ नहीं जानते, सिवाय इसके कि वो मुसलमान हैं, उन्हें मजहबे इस्लाम की छोटी-छोटी बातें बताई और सिखाई जायें।
यहां इस्लाम के बडे़-बड़े उलेमाए दीन, बडे़-बडे़ मुफ्फक्किर आते हैं और इमान अफरोज तकरीरें करते हैं। सोते जहनों और बेहिस दिलों को झंझोड़कर बेदार कर देते हैं। इसी के साथ यहां छोटे-छोटे हल्के होते हैं। इन हल्कों और आम हालात में जमातों के जरिये होने वाले हल्कों में दीन की तालीम भी होती है और यह भी बताया जाता है कि इस्लाम कितना सादा और कितना आसान मजहब है।
इज्तिमा में आये इस्लामिक स्काॅलर मजहबी तकरीर देते हैं लोगों मजहब और इमान के रास्ते पर चलने के लिए कहते हैं। इज्तिमा के दौरान उन बातों पर चर्चा होती है जिनसे एक मुसलमान दीन के रास्ते पर बेहतर ढंग से चल सके, इसमें खर्चीली शादी न करने के बारे में लोगों को समझाया जाता है। इस्लाम में परेशान हाल लोगों की मदद के लिए ज़कात क्यों रखी गयी है। पड़ोसी और रिश्तेदारों के इस्लाम में क्या हुकूक हैं। सूदखोरी क्यों हराम है, जैसे मसलों पर तकरीर की जाती है।
यहां बडी तादाद में निकाह भी कराये जाते हैं जिनमें किसी भी तरह का कोई दहेज नहीं लिया और दिया जाता है। सादगी के साथ जिन्दगी जीने का तरीका सिखाया जाता है। यहां पर लोगों को यह भी बताया जाता है कि इस्लाम के मुताबिक अपनी रोजाना की जिन्दगी को कैसे गुजारा जाए।
इज्तिमा में ये कैद भी नहीं कि सिर्फ वही लोग आयें या शिरकत करें जो कट्टर मुसलमान हैं। न ही यहां ऐसी कोई रोक है। यहां पर सभी लोग आ सकते हैं। यहां पर जिन्दगी गुजारने का वो तरीका बताया जाता है जो इस्लाम में सही ठहराया गया है। इस्लाम मजहब में सबसे ज्यादा इस बात पर जोर दिया गया है कि एक सही इन्सानी जिन्दगी कैसे गुजारी जाये। इस्लाम दरअसल एक मुकम्मल राबता-ए-हयात है।
जिन्दगी का कोई भी शोबा और कोई भी जरूरी या फितरी काम ऐसा नहीं है जिसके बारे में इस्लाम में कोई हिदायत कोई उसूल न हो, इसलिए हम कहते हैं कि इस्लाम नाम है इन्सानी जिन्दगी गुजारने के चन्द उसूलों का और इस इज्तिमा में यही उसूल इस्लाम की यही छोटी से छोटी बातें लोगों को बताई जाती हैं।
हम जैसे बहुत से अन्जान लोग इससे सबक लेते हैं और एक बेहतरीन इन्सानी मिसाले जिन्दगी गुज़ारकर दुनिया में इज्जत पाते हैं। और अपने खुदा से भी सुर्खरू होते हैं।
इस्लाम ने हमेशा रहम और मुहब्बत और इन्साफ का हुक्म दिया है। मुसलमान को पहला सबक ईमान और वफा का दिया जाता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह आलमी तब्लीगी इज्तिमा सारी दुनिया से आये लोगों को इस्लाम के मुताबिक सही जिन्दगी गुजारने और दीन की दावत सारी दुनिया में पहुंचाने का सबक देता है। लाखों लोगों के इस प्रोग्राम को इतनी खूबसूरती और डिसीप्लिन के साथ किया जाता है कि किसी को कोई तकलीफ न पहुंचे। इसके लिए हजारों की तादाद में वालेंटियर्स इज्तिमा शुरू होने से काफी दिन पहले से इसके इंतजामात में लग जाते हैं और इज्तिमा होने के दौरान और उसके बाद तक निजाम को सम्भालने में दिलो जान से लगे रहते हैं। इस प्रोग्राम को कामयाब बनाने में शासन और प्रशासन का भी बहुत सहयोग रहता है।
इस साल भी इस आलमी तबलीगी इज्तिमा में तकरीबन दस लाख लोगों ने शिरकत की। इस बार 33 देशों से 433 मेहमान आये जिनकी हिफाजत के लिए 3 लेयर की सिक्यूरिटी लगाई गई थी हर लेयर पर 50-50 वालिंटियर और 10 पुलिस कर्मी भी होते हैं।
इस साल पहले दिन फजिर की नमाज के बाद इन्दौर से आये मुफ्ती अजीज साहब ने बयान किये। फिर दिल्ली मरकज से आये मौलाना साद साहब कांधलवी ने बयान किया। साद साहब ने कहा कि दुनियां में जो आया है उसे लौटकर अल्लाह के पास जाना है, आसमान पर एक दुनिया है जिसकी जिन्दगी का कोई अन्त नहीं।
आलमी तब्लीगी इज्तिमा के दूसरे दिन की शुरूआत फजिर के नमाज के बाद मेवात से आये मौलाना उमर मनी के बयान के साथ हुई उन्होंने लोगों से नेकी के रास्ते पर चलने को कहा। इसके अलावा एक दूसरे से भलाई के साथ सुलूक पर भी जोर दिया।
जोहर के बाद दिल्ली से आये मौलाना यूसुफ की तकरीर हुई; उन्होंने कहा कि न ब्याज से रूपये लें और न ही ब्याज दें। अल्लाह पर यकीन रखा जाए तो हर रास्ता आसान हो सकता है। बडे़-बड़े लश्कर सहाबियों के सामने कई बार छोटे साबित हुए हैं। इसलिए हम यकीन से अपनी आखिरत को बेहतर बना सकते हैं।
इज्तिमा के तीसरे दिन मौलाना जमशेद साहब ने अपने बयान में कहा कि दीन का काम सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक इबादत है जो इन्सान को अल्लाह के करीब ले जाती है।
मौलाना सईद साहब ने बताया कि इस्लाम सिर्फ इबादत का मजहब नहीं, बल्कि इन्सानी जिन्दगी के हर पहलू को सम्भालने वाला मजहब है। मुसलमान अपने किरदार से इस्लाम का सच्चा पैगाम दूसरों तक पहुंचायें।
मौलाना मजहर तौहीद साहब ने कहा कि मुसलमानों को हर वक्त अल्लाह पे भरोसा रखना चाहिए और अपने सभी कामों में उसकी रज़ा को एहमियत देना चाहिए।
इज्तिमा के चैथे दिन सुबह फजिर की नमाज के बाद मौलाना साद साहब का खास बयान हुआ इसमें उन्होंने जमातों में जाने वाले लोगों को इस सफर में अपनाये जाने वाले अख्लाक, रखे जाने वाले ख्याल और किये जाने वाले कामों को समझाया। इसके बाद दुआ हुई और दुआ के बाद इज्तिमा से तकरीबन 2000 जमातें देश भर के लिए निकलीं।
इस बार करीब 6 सौ एकड़ एरिया में इंतेजाम किये गये। जिसमें 3 सौ एकड़ में पार्किंग, सौ एकड़ में पंडाल और 200 एकड़ में दूसरे इन्तिजामात जैसे फूड जोन, वुजू खाना, वाशरूम वगैरह शामिल है। यहां पर एलोपैथिक, आर्युवेदिक और यूनानी तरीकों से इलाज के लिए मेडिकल केंप भी लगाये गये हैं। इज्तिमा में पानी की बोतल को छोड़कर दूसरे सभी सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन था। पानी की बोतलों को भी फौरन इकट्ठा किया जा रहा था।
शासन-प्रशासन की मदद और वालिंटयरस की मेहनत से इस बार भी हर साल की तरह लाखों लोगों का यह आलमी तब्लीगी इज्तिमा कामयाबी से मुकम्मल हुआ। अल्लाह इस रास्ते में मेहनत करने वालों की मेहनत को कुबूल फरमायें और उन्हें इसका अज्र अता फरमाये। दुनिया में अमनो अमान हो और लोगों में भाईचारा व मोहब्बत आम हो यही हमारी दुआ है। आमीन।
– रईसा मलिक