सरमद रह. ईरान के किसी खानदान से ताअल्लुक रखते थे। आप मुशर्रफ व इस्लाम हुए। सरमद रहमतुल्लाह अलैह नाम रखा गया। इल्मे फजल में माहिर थे। पेशा तिजारत था। अक्सर तिजारती अगराज से हिन्दुस्तान भी आते थे। सिन्ध में एक शहर ठठ्ठा था जहां किसी हिन्दू लडके से आपको इश्क हो गया। सिन्ध के बयाबानों में दशत्नवर्दी (वनो में फिरना) की। यह शंहशाह आलमगीर की हुकूमत का जमाना था। सरमद भी चलते फिरते दिल्ली आ गए। दारा शिकोह जो बुजुर्गों से अकीदत रखता था, उसने अपने यहां की सुहबत में नवाज लिया। आलमगीर को यह बात खटकी और उसने किसी बहाने से सरमद को कत्ल करना चाहा। उस जमाने में सरमद ने एक रूबाई लिखी थी-
इस रूबाई का यह मतलब लिया गया कि सरमद मेराजे जिस्मानी का मुनव्विर है और एक बहाना कत्ल का तलाश कर लिया गया। फिर सरमद बरहना रहा करता था। उससे वजह पूछने के लिए मुल्ला कवी को भेजा। सरमद ने कहा कि चूंकि शैतान कवी है इसलिए बरहना रहता हूं। मुल्ला बडे बरहम हुए मगर अब भी कत्ले सरमद के लिए कोई माकूल मवाद मुहैया नहीं हुआ। आखिर यह तय पाया कि सरमद को उलमा के जलसे में तलब किया जाये। चुनांचे बुलाया गया।
सरमद गये तो आलमगीर ने पूछा कि लोग कहते हैंः सरमद ने दारा शिकोह को सल्तनल मिलने की खबर दी थी।
क्या यह सच है?
सरमद रहमतुल्लाह अलैह ने कहा। हां , और वह खबर दुरूस्त निकली क्योंकि वह अबद तक ताजपोश रहेगा।
मुफ्तियों ने कहा बरहनगी शरीअत के खिलाफ हैं लिबास पहनना चाहिये। सरमद ने परवाह न की। फिर कहा गया- कलमा पढो। सरमद ने हस्बे आदत सिर्फ ला इलाहा कहा। जब कहा, आगे पढो तो कहा अभी नफी मंे गर्क हूं। इसबात तक नहीं पहुंचा। आगे पढना झूठ होगा। उलमा ने कुफ्र का फतवा लगा दिया। सरमद रहमतुल्लाह अलैह का कत्ल 1072 हिजरी में हुाअ।
आपके किसी अकीदतमन्द ने मस्लेहते वक्त के लिहाज से कहा कि इन खयालात को बदल दीजिए तो कहा-
उम्र सुस्त की अफसाना मंसूर कुहन शुद
मन अज्र सरे नौ ता बूद व हम दार व रसनरा
तमाम दुनिया ने यह तमाशा देखा। बाज का ख्याल है कि सरमद की कब्र जहां समझी जाती है, वहां नहीं है मगर दिल्ली में कुर्बे जामा मस्जिद जियारतगाह खास व आम हैं कहते हैं कि वादे शहादत सरमद ने पूरा कलमा पढा। इस वाकेआ के बाद आलमगीर ने एक कर्न (युग) हुकूमत की। मगर राहत नसीब न हुई। आपकी रूबाईयात का जो मजमूआ शाया शुदा है, वह मकबले आम है और सरमद शहीद रह. अलैह आज भी जिन्दा हैं।